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August 1, 2021

शहीद चन्द्रशेखर आजाद एक क्रांति एक विचारधारा

नई दिल्ली. स्टारलोकप्रवाह

गठीला बदन,रोबीला चेहरा, मूंछों पर ताव, और बगल में ठूंसा रिवाल्वर ,शेर जैसी शख्सियत बरबस ही चंद्रशेखर आजाद की छवि उभर आती है. भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के चमकते हुए सितारे, महानायक एवं लोकप्रिय स्वतंत्रता सेनानी चंद्रशेखर आजाद का जन्म 23 जुलाई, 1906 को मध्यप्रदेश के झाबुआ जिले के भावंरा नामक गांव में हुआ था उनके पिता का नाम पंडित सीताराम तिवारी एवं माता का नाम जगरानी देवी था। उनके पिता ईमानदार, स्वाभिमानी, साहसी और वचन के पक्के थे। यही गुण चंद्रशेखर को अपने पिता से विरासत में मिले थे। कहा जाता है कि उनके जन्म के समय किसी ने कहा कि उन्हे शेर का मांस खिलाओ तो बेटा शेर जैसा होगा और हुआ भी वह सिर्फ खुद ही शेर नहीं थे अपितु उन्होंने अपने जैसे देशभक्त शेरों का झुंड भी तैयार किया।

चंद्रशेखर आजाद 14 वर्ष की आयु में बनारस विद्याध्ययन के लिये चले गये और वहां एक संस्कृत पाठशाला में पढ़ाई की। उन्हें पढाई के साथ साथ व्यायामका भी शौक था अंग्रेजों के जुल्म और देश के लिये मर-मिटने की भावना तो जैसे उनके खून में ही भरी हुई थी वहां उन्होंने कानून भंग आंदोलन में बढ़-चढ़कर भाग लिया क्यों कि उन दिनों गुरुकुल देशप्रेमियों और क्रांतिकारियों का केंद्र हुआ करते थे वहां उनकी मुलाकात महान क्रान्तिकारी गणेशंकर विद्यार्थी जी से हुई और वो देशप्रेम के रंग में रंगते चले गये। 1920-21 के वर्षों में वे गांधीजी के असहयोग आंदोलन में उन्होंने सक्रिय हिस्सा लिया और पकड़ें गये। और उन्हें जज के समक्ष प्रस्तुत किया गया चेहरे पर लेशमात्र भी शिकन या डर नहीं था जज के परिचय पूछने पर इस शेर नें दहाड़ कर अपना नाम ‘आजाद’, पिता का नाम ‘स्वतंत्रता’ और ‘जेल’ को उनका घर बताया।

अंग्रेजी जज ने उन्हें 15 कोड़ों की सजा दी गई। नन्हें और मासूम बदन पर पड़ते हर कोड़े के वार के साथ उन्होंने, ‘वन्दे मातरम्‌’ और ‘भारतमाता की जय’ का स्वर बुलंद किया। इसके बाद वे सार्वजनिक रूप से आजाद कहलाए। क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद को उनके सभी साथी आदर से पंडित जी के नाम से संबोधित करते थे उनकी ख्याति दिनों-दिन बढ़ती जा रही थी और क्रांतिकारी उनसे जुड़ते जा रहे थे।जब क्रांतिकारी आंदोलन उग्र हुआ, तब आजाद उस तरफ खिंचे चले गए और ‘हिन्दुस्तान सोशलिस्ट आर्मी’ से जुड़ गये।महान क्रान्तिकारी पंडित रामप्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में आजाद ने काकोरी काण्ड (1925) में सक्रिय भाग लिया और चलती ट्रेन से अंग्रेजों का सरकारी खजाना लूट लिया और पुलिस की आंखों में धूल झोंककर फरार हो गए।इस कार्य से जहां आजाद और उनके दल के सदस्यों रामप्रसाद बिस्मिल,भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव, अशफाक, राजेंद्र लाहिड़ी, ठाकुर रोशन सिंह,की ख्याति चारों ओर फैल गयी वहीं दूसरी और अंग्रेजों की आंख की किरकरी बन गये।

उन्ही दिनों साईमन कमीशन का विरोध करते समय जब लाला लाजपतराय जी की अंग्रेज़ो के लाठीचार्ज से मौत हो गयी तो इन वीर बांकुरों की भुजायें फड़क उठी और उन्होंने इस कृत्य को सारे हिन्दुस्तान का अपमान समझा और बदला लेने की ठानी।17 दिसंबर, 1928 को चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह और राजगुरु ने शाम के समय लाहौर में पुलिस अधीक्षक के दफ्तर को घेर लिया और ज्यों ही जे.पी. साण्डर्स अपने अंगरक्षक के साथ मोटर साइकिल पर बैठकर निकले तो राजगुरु ने पहली गोली दाग दी, जो साण्डर्स के माथे पर लग गई वह मोटरसाइकिल से नीचे गिर पड़ा। फिर भगत सिंह ने आगे बढ़कर 4-6 गोलियां दाग कर उसे बिल्कुल ठंडा कर दिया। जब साण्डर्स के अंगरक्षक ने उनका पीछा किया, तो चंद्रशेखर आजाद ने अपनी गोली से उसे भी समाप्त कर दिया।इतना ना ही नहीं लाहौर में जगह-जगह परचे चिपका दिए गए, जिन पर लिखा था- लाला लाजपतराय की मृत्यु का बदला ले लिया गया है। उनके इस कदम को समस्त भारत वर्ष में उनकी ख्याति फैल गयी।और अंग्रेजी सरकार उनके खून की प्यासी हो गयी।जब भगतसिंह राजगुरु सुखदेव बटुकेश्वर ने सेंट्रल असेंबली में बम फेंका तो उस वक्त चंद्रशेखर आजाद पठान के वेश में वहां मौजूद रहे वो चाहते थे कि भगत सिंह अपनें साथियों के साथ वहां से निकल जायें क्योंकि वह अपने साथियों को खोना नहीं चाहते थे परंतु भगतसिंह की जिद्द के आगे उन्हें झुकना पड़ा। अपनें क्रांतिकारी साथियों को बचाने के लिये वे महात्मा गांधी और जवाहर लाल नेहरु से मिले और भगत सिंह और साथियों को बचाने की गुहार लगाई। परंतु इन दोनों नेताओं ने मदद करनें से इंकार कर दिया।

इलाहाबाद आन्नंद भवन में जवाहरलाल नेहरु से मुलाकात के बाद वो साईकल से अलफ्रेड पार्क में पंहुचे जहां किसी देशद्रोही की सूचना पर अंग्रेजी पुलिस नें उन्हें घेर लिया।वो अंतिम समय तक अंग्रेजी सरकार से लडते रहे अंत में जब एक ही गोली शेष रह गयी तो उन्होंने अंतिम बार मां भारती को प्रणाम किया उसकी रज को माथे से लगाकर कहा माफ करना मां बस इतनी ही सेवा कर सका और अंतिम गोली खुद को मारकर शहीद हो गये प्रण के पक्के आजाद ने अपना आजाद रहने का प्रण भी निभा दिया क्योंकि 1931 में उन्होंने रूस की बोल्शेविक क्रांति की तर्ज पर समाजवादी क्रांति का आह्वान किया। उन्होंने संकल्प किया था कि वे न कभी पकड़े जाएंगे और न ब्रिटिश सरकार उन्हें फांसी दे सकेगी।इसी संकल्प को पूरा करने के लिए उन्होंने 27 फरवरी, 1931 को इसी पार्क में स्वयं को गोली मारकर मातृभूमि के लिए प्राणों की आहुति दे दी।

मां भारती नें अपनी कोख से लाखों लाडले शहीदों भगतसिंह, राजगुरु, सुखदेव, बटुकेश्वर दत्त, दुर्गा भाभी उनके पति वोहरा जी, पं रामप्रसाद बिस्मिल, खुदीराम बोस, मंगल पांडे, महारानी लक्ष्मीबाई, ठाकुर रोशन सिंह, लाला लाजपत राय, ऊधम सिंह, मदनलाल ढींगड़ा, सुभाष चंद्र बोस, वीर सावरकर जैसे वीर बलिदानियों को पैदा किया और इन्हीं में से भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के क्षितिज पर चमकता सूर्य है चंद्र शेखर आजाद।

चंद्रशेखर आजाद एक व्यक्ति नहीं एक विचारधारा एक आंदोलन थे जिनसे आज भी लाखों युवाओं को देशभक्ति की प्रेरणा मिलती है आज भी इनसे प्रेरणा पाकर लाखों युवा सीमा पर शहीद हो जाते हैं आजाद के जीवन में जाति, क्षेत्र,धर्म, ऊंच-नीच का कभी  स्थान नहीं था उनका सपना भारत के जन-जन को विदेशी आक्रांताओं से आजाद कराना था.

बी डी कौशिक

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